Wednesday, 22 June 2016

पैसा लेकर टिकट देने की दलित राजनीति


अजय कुमार पांडेय
बसपा सुप्रीमो मायावती पर स्वामी प्रसाद मौर्या ने दलित नहीं दौलत की बेटी हैं मायावती कहकर सनसनी मचा दी। यह पहली बार नहीं है कि मायावती पर किसी ने पैसे लेकर टिकट देने का आरोप लगाया है। इससे पहले भी मायावती पर अखिलेश दास, बाबू सिंह कुशवाहा, दारा सिंह चौहान और रामवीर उपाध्याय ने हमला बोला है।

राजनीतिक गलियारों में जब मायावती के टिकटों के नीलाम किए जाने की खबरों पर दलित वर्ग आम तौर पर चुप्पी साधे रहता है। जाहिर है माया का यह दौलत प्रेम वोटों के स्थानांतरण के जरिए उनके कारोबार को बढ़ावा देता है। कांशीराम  की स्थापित की गई बहुजन समाज पार्टी का यह चेहरा बहुत पहले से बेनकाब होता रहा है। जिस दलित समाज को सामाजिक स्तर के ऊपरी सतह पर लाने के लिए यह पार्टी बनी थी। उसे अब पार्टी पूरी तरह से नकार चुकी है। ऐसे में पार्टी के अंदर अंतर विरोधों का बढ़ना मायावती के लिए एक संकेत है। वह संभल जाए।

दलित तबके को महज वोट बैंक की तरह देखने वाली मायावती के लिए यह खतरे की घंटी है कि वह अपनी दलित राजनीति को नया रूप दें। जिससे दलित समाज को माया में आस्था बरकरार रखने को बल मिल सके। आजादी के करीब 68 सालों के बाद अब दलित समाज में कई तरह के बदलाव आए है। महज वोट बैंक के तौर पर माया अब बहुजन की सोशल इंजीनियरिंग कर दलितों पर राज नहीं कर सकतीं।

एक के बाद पार्टी से छिटकते नेताओं का जाना बसपा में कोई नई बात नहीं है। पर माया पर लगते आरोप उन्हें कमजोर करने में कोई  नहीं छोड़ेंगे। चाहे जन्मदिन की पार्टी में गहनों से लदी मायावती की बात करें या पार्टी चंदे के नाम पर की जा रही धनउगाही की। माया ने अपने विधायकों और सांसदों को टिकट देते समय हर बार खूब पैसा वसूला। शायद मायावती जानती है कि यह विधायक और नेता अपने पैसे की वसूली जनता से कर ही लेते हैं। ऐसे में यह मायावती की बसपा पालिटिक्स का नया मंत्र हो सकता है।



Sunday, 14 February 2016

यह विरोध की भाषा नहीं

अजय कुमार पांडेय

जेएनयू में गरमाई राजनीति और देश विरोधी नारे लगाने को कही से सही नहीं ठहराया जा सकता। देश के इस सबसे प्रतिष्ठित संस्थान में अफजल गुरु के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों पर चर्चा की बात तो समझी जा सकती है। पर जब यह देश विरोधी मानसिकता के तौर पर सक्रिय हो जाए तो इसे रोकना ही जरूरी होगा।

अफजल गुरु का हाथ संसद पर हमले में था। ऐसे में उसे शहीद बताकर पाकिस्तान समर्थन में नारे लगाना और कश्मीर की आजादी को सही ठहराना कतई जायज नहीं है। भारतीय लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। पर इसका यह मतलब नहीं है कि यह देश विरोधी हो।

जेएनयू छात्रसंगठन के अध्यक्ष कन्हैया की गिरफ्तारी को कई संगठन गलत बता रहे हैं। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि कन्हैया कोई बच्चा नहीं है जो राष्ट्र विरोधी भाषा नहीं समझ सकता है। 

अब जब कन्हैया की गिरफ्तारी हो चुकी है तो देश की पार्टियों को इसमें राजनीति का मौका नजर आने लगा है। कांग्रेसी उपाध्यक्ष नये साल का उत्सव विदेश में मनाकर पूरी तौर पर तरोताजा हो चले है। ऐसे में बीते रोज जब वह जेएनयू के छात्रों की हौसलाअफजाई करने पहुंचे तो उनकी भाषा को समझा जा सकता है।

दूसरे तरफ वाम दल गृह मंत्री से मिलकर कार्रवाई नहीं किये जाने की गुहार लगा रहे थे। वाम दलों को पूरी तरह से मालूम है कि इस मामले से पूरा पक्ष भाजपा की केंद्र सरकार की तरफ झुकता दिख रहा है। ऐसे में माकपा पोलित ब्यूरो के अध्यक्ष सीताराम येचुरी राजनाथ सिंह से मिले । राजनाथ सिंह ने उन्हें किसी निर्दोष पर कार्रवाई नहीं किये जाने का भरोसा  दिया। 

मामले को लेकर राजनीतिक पार्टियां अब रोटी सेंकने में जरूर लग गयी हों। लेकिन इतना तो तय है कि विश्वविद्यालय राजनीति के केंद्र नहीं बनाए जा सकते। इसमें देश की गाढ़ी पूंजी लगी है। जेएनयू में देश का खून पसीना लगा है। ऐेसे में विरोध का तरीका बहुत सारे हैं। पर देश विरोधी और पाकिस्तान परस्ती को हरगिज कोई भारतीय सही नहीं कहेगा।




Saturday, 9 January 2016

सुब्रमण्यम देश के शिक्षा और स्वास्थ्य का हाल बताएं

सुब्रमण्यम बेरोजगारी पर क्यों नहीं बोलते
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देश में मानों मुद्दों का अकाल हो गया है. कोई मसजिद  बना रहा है तो कोई मंदिर बनाने में लगा हुआ है. राजनीति का रंग चोखा करने के लिए राजनीतिक पार्टियां भी खूब चटकारे ले रही हैं.
भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी राम मंदिर के नये ठेकेदार के तौर पर उभरे हैं. हाल में दिल्ली विश्वविद्यालय में राम मंदिर जैसे विवादित मुद्दे को हवा देने के लिए स्वामी ने पूरी ताकत झोंक दी. शिक्षा संस्थानों में राजनीति को हवा देने और शिक्षा का माहौल खराब करने की दिशा में यह नया कदम है. 

भाजपा नेता और प्रसिद्ध वकील सुब्रमण्यम स्वामी बेरोजगारी के मुद्दे पर नहीं बोलते. देश  के स्वास्थ्य और शिक्षा के मामले पर वह चुप्पी मार जाते है. मानो जैसे देश के सभी मामले खत्म हो गये हों और केवल राम मंदिर बनाना ही काम रह गया है.

किसानों का दुख दर्द उनको दिखाई नहीं देता. देश करीब चार हजार से ज्यादा किसान सूखा की भेंट चढ़ गये हैं. पर नेता इन सब पर आंखें मूदे हुए हैं. उन्हें इस पर कोई बयान नहीं देना है.  सिर्फ एक मुद्दा ही रह गया है वह है राम मंदिर बनाने का , इसके बाद देश में राम राज्य आ जायेगा.

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने मंदिर मस्‍जिद पर नया बयान देकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है. पर क्या सुब्रमण्यम अपने पारिवारिक समाज को नहीं देखते और महज बयान बाजी करते हैं. सुब्रमण्यम का परिवार ईसाई और हिंदू का मिलन है. बेहतर होगा स्वामी इस बात को समझें और भारतीयता को बरकरार रखें.

 अब स्वामी ने अपने ट्वीट देखिए इसमें लिखा है कि हम हिंदू, मुसलमानों को भगवान श्रीकृष्‍ण का ऑफर कर रहे हैं-वे हमें केवल तीन मंदिर दे दें और बदले में 39,997 मस्‍जिद रख लें. ऐसा लगता है कि स्वामी की ही मंदिर संपत्ति हो . 

मुझे आशा है कि वह दुर्योधन नहीं बनेंगे. वहीं इससे पूर्व स्वामी ने दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित सेमिनार में राम मं‌दिर निर्माण को लेकर कहा कि देश के उत्थान के लिए राम मंदिर का निर्माण करना जरूरी है. उन्होंने कहा, ‘हम मंदिर बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. मैं जो कहता हूं वह होता है, अब कह रहा हूं कि मंदिर बनेगा.’ 

अगर स्वामी भाग्यविधाता और जो कहते हैं वह होता है तो गरीबी और अशिक्षा को भी दूर कर दें. देश से कुपोषण और बेरोजगारी को दूर कर दें. कर दीजिए स्वामी.

स्वामी हिंदू परिषद के दिवंगत नेता अशोक सिंघल द्वारा स्थापित संस्थान अरुंधति वशिष्ठ अनुसंधान पीठ की ओर से डीयू की आर्ट्स फैकल्टी स्थित कॉन्फ्रेंस सेंटर में आयोजित सेमिनार में बोल रहे थे.

स्वामी भड़काने का काम डीयू में नहीं चलेगा. जाइए कहीं और अपने इरादे पूरे करिए. यह आरएसएस का संगठन नहीं.

Wednesday, 25 November 2015

लालू जबरिया गले लग गये--- अरविंद

वह दिल्ली के तख्तों ताज के मालिक हैं. हां आप सही समझ रहे हैं बात अरविंद केजरीवाल की ही कर रहा हूं. सीधा सा दिखने वाला यह आम आदमी पार्टी का मुखिया अब जनता को पूरी तरह से बेवकूफ समझने लगा है.
बिहार चुनाव के नतीजों के बाद नीतीश की ताजपोशी में यह पटना गये. वहां पूरी तरह से राजनीति में केजरीवाल रमे नजर आए. दिग्गज राजनेताओं के लक्षण दिखाते समय केजरीवाल मानो यह भूल ही गये कि वह आम आदमी के बलबूते सत्ता में आए हैं.

दिखावा और छल प्रपंच ज्यादा समय तक नहीं टिकता. लालू की तरह नौटंकी में माहिर केजरीवाल ने राजनीति में वह सभी पैंतरे चले जो सत्ता पाने के लिए चाहिए थे. धन, बल और छल सभी हथकंडों को अपना अपने भोले रूप से जनता को गुमराह कर सीएम की कुर्सी तो पा ली, पर जनता की दिक्कते दूर नहीं होती दिख रहीं हैं. वैसे भी दिल्ली में जनता सड़क, बिजली और पानी जैसी केवल बुनियादी सुविधाएं ही सरकार से लेती है. दिल्ली में केंद्र सरकार का भी दखल रहता है तो यह सुविधाएं आम तौर पर पूरी रहती भी हैं. इस तरह से इन सब के अलावा केजरीवाल दिल्ली को अपने शासन के पांच साल में क्या देते हैं. इस पर दिल्ली के लोगों और देश की नजरें  भी रहेंगी.


अब आते हैं लालू के साथ केजरीवाल के गलबहिया करने की. नीतीश के पांचवी बार मुख्यमंत्री बनने पर जब अरविंद केजरीवाल समारोह में पहुंचे तो लालू ने केजरी को पकड़कर पूरा चिपकाकर गले लगाया. केजरीवाल भी लालू से चिपकर और हाथ उठा- उठाकर अपने आगे की राजनीति की तरफ इशारा कर रहे थे. महागठबंधन की जीत और समारोह में केजरीवाल ने यह जताने का पूरा प्रयास किया कि भविष्य की राजनीति में वह कद्दावर नेता बनने की राह पर चलने वाले हैं. पर जनता तो सब जानती है.

आम आदमी का चारा घोटाले के सरगना से इस तरह से गलबहिया करना जनता को नागवार गुजरा. इसकी वजह साफ थी क्योंकि अरविंद की साफ छवि की वजह से ही दिल्ली की जनता ने उन्हें गद्दी सौंपी थी. देश ने अन्ना आंदोलन की वजह से केजरीवाल को राजनीति में आने का रास्ता दिया. इन सबको दरकिनार कर केजरीवाल लालू को गले लगाते रहे.

पर दिल्ली पहुंचने पर माजरा बदल गया. केजरीवाल पूरी तरह से दुहाई देते दिखे. मीडिया को यह सफाई देते रहे कि उन्हें लालू ने जबरदस्ती गले से लगाया और हाथों को पकड़कर ऊपर उठा दिया. केजरीवाल का यह बयान जब राजद नेताओं ने देखा तो केजरीवाल के इस रवैये की आलोचना की. पटना में केजरीवाल बहुत सह्दयता दिखाते रहे और दिल्ली जाते ही बदल गये.

केजरीवाल का रूप पहली बार नहीं बदला है. इससे पहले भी केजरीवाल ने विधान सभा दिल्ली में मार्शलों से विधायकों को पिटवाने और आम आदमी पार्टी से कई योग्य नेताओं को ठिकाने लगाने का काम किया. केजरीवाल लोकपाल बिल लाने और तमाम दूसरी सुविधाओं के नाम पर सत्ता में आए. पर केजरीवाल कितना बदल गये हैं. केजरीवाल का यह चेहरा आम आदमी भी देख रहा होगा.




 

Monday, 23 November 2015

चांद के पार चलो- किरण राव(आमिर की बीबी)

यह शोहरत पाने का नया शगल होगा
# aamirkhan # shahrukh khan # khan # PM Narendra MODI
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ये फिल्मी पर्दे के सितारे हैं. इन्हें पूरे भारत से ज्यादा कोई वास्ता नहीं पड़ता. एक तय दुनिया में ये जीते और मरते है. आमिर , शाहरुख और सलमान से लगाये तमाम फिल्मी जगत की हस्तियां एक निजी माहौल में रहते हैं. ऐसे में कल गोयनका अवार्ड में आमिर की चिंता बड़ी नाजायज सी लगी. एसी और तमाम दूसरी सुविधाओं के बीच रहने वाला आमिर नाम का सितारा जब असहिष्णुता और सुरक्षा के नाम का रोना रोता है तो मन में एक अजब सी टीस उठती है.
 थ्री इडियट का वह रैंचो नाम का जीवट किरदार निभाने वाला यह आदमी कितना दोहरापन लिये जीता है, यह हम सब देख रहे हैं.

कोई सड़क और गली- मुहल्ले में रहने वाला आम आदमी यदि असहिष्णुता और जीवन के खतरे की बात करे तो पचती है. ये सितारे जो हरदम सुरक्षा घेरे में रहते हैं और जीवन की विलासिता में डूबे हैं, प्रचार के नये हथकंडे अच्छे से खोज लेते है. आमिर की बीबी किरण राव को भारत में डर सताने लगा है.
शाहरुख को भी डर लगता है अभी यह लिस्ट और लंबी हो सकती है. कई फिल्मी नौटंकिए इसमें गुलजार हो सकते हैं. शाहरुख भी इस तरह के बयानों से पब्लिक आई खीचते हैं. फिलहाल आमिर के डर को भारत के लोग शांत करा पाते है या नहीं.
एक अभिनेत्री हैं माधुरी जो श्रीराम के साथ विवाह कर अमेरिका गयीं और फिर भारत वापस आ गयीं. वह बहुत देशप्रेमी हैं. वह अमेरिका की नागरिकता लेकर इंडिया (भारत)   में आ गयी. उन्हें देश की याद सताने लगी.
 आमिर जी आपको और आपकी बीबी किरण को भारत में रहने में डर लग रहा हो तो दुनिया के किसी देश में जाकर बस चाहिए. लेकिन हम लोगों के पास कोई चारा नहीं है इसी असहिष्णु और सहिष्णु भारत में रहने के सिवाय. आपके पास पैसे की पोटली है. कही से जाकर सहिष्णुता खरीद लीजिए. हम सब भारत वासी इसी असहिष्णु भारत में रहकर इसे सहिष्णु बनाने का काम करेंगे.
भारत पोस्ट हिंदू- मुसलिम की नहीं एक भारतीय की है. आप की कोई जाति नहीं है. आप यह अच्छे से जानते हैं आमिर जी. और आदमी का मजहब केवल इंसानियत का होता है, यही होना चाहिए. मोदी जी को सबक जनता देती रहेगी. गाय, भैंस, घोड़ा, बकरी और मंदिर, ताजमहल के लिए जनता ने उन्हें कुर्सी पर नहीं बिठाया है. असहिष्णुता को आमिर आप इस तरह से ढोंग मत बनाइए. अच्छा नहीं लगता.

Monday, 9 November 2015

लालू का क्या इलाज करेंगे नीतीश

बिहार के जश्न में
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खूब चुनावी चकल्लस चला. पूरा देश बिहार मय हो गया. यह चुनावी समर पूरे देश के लिए किसी रोमांचकारी फिल्म या मनोरंजन से ज्यादा ही उत्साही रहा. मोदी की हार के बाद नीतीश को बिहार की गद्दी तो मिल गयी. लेकिन यक्ष प्रश्न है कि नीतीश का विकास राज लालू के साथ चल पायेगा. यह सवाल किया जाना लाजमी है. इसकी पुरानी वजहें भी हैं आखिर कब तक लालूनामा नीतीश रोक पायेंगे. ऐसे में जब पूरा परिवार ही राजनीति की कमान पकड़े हो.

नीतीश ने अभी मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं ली है. लेकिन इस जीत के बाद से ही सचिवालय और तमाम सरकारी दफ्तरों के नौकरशाहों की नींद उड़ गयी है. यह नींद नीतीश के जश्न मनाने पर नहीं लालू के जोकरिया अंदाज और घटिया रवैये को लेकर है. नौकरशाह अपने पूर्व के अनुभव बताते हैं कि भले ही नीतीश विकास के पैमाने गढ़ ले , पर जंगलराज का साथ उन्हें डूबोएगा जरूर.

दिल्ली के रमेश कुमार चंद्र कहते हैं कि पांच साल से दिल्ली में रिक्शा चला रहा हूं, नीतीश को सब लोग वोट किया लेकिन लालू का साथ ही नीतीश को डुबोएगा. इतना ही नहीं कई जानकार मानते हैं कि जंगलराज तो शुरू होगा ही आखिर शेर के मुंह खून लगा हो तो वह कितने दिन बकरी से दोस्ती निभाएगा.


फिलहाल जश्न मनाइए जीत और त्योहार दीवाली का. आपका त्योहार शुभ हो और मंगल हो . समय -समय पर आपको जंगल राज लालू जोकरिया का आनंद भी मिलेगा . मस्त रहिए लेकिन चौकन्ना रहिएगा

Friday, 2 October 2015

why pm modi not stop beef

भारत बीफ़ का एक्सपोर्टर है ?

घिन आती है धर्म के ठेकेदारों से
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अक्सर  देश की राजधानी में बड़े-बड़े बुद्धिजीवी मोदी के सरकार बनने की 

बात सुनकर और सोचकर ही घबराने लगते थे। तब मुझे समझ में नहीं 

आता था कि ये बुद्धिजीवियों को हो क्या गया है। वे मोदी के दिल्ली में 

सरकार बनाने से घबरा क्यों जाते हैं। लेकिन अब उनकी समझ पर ज्यादा 

भरोसा होता दिख रहा है। हालिया मामला दादरी के इखलाख  के मारे 

जाने का है। मैं नहीं जानता कि वह कौन है और क्या करता था।

लेकिन इतना तो तय है कि वह इंसान था। आईएसआईएस वाले भी 

इंसान हैं।   इखलाख  कही ज्यादा बेहतर इंसान रहा होगा। 

 लोग अपने घरों की चारदीवारी में न जाने किस-किस जानवर का मीट या 

बीफ या खाने वाली चीजें खाते होंगे। लेकिन किसी को कोई आपत्ति करने 

का कोई हक नहीं है। किसी की भी स्वतंत्रता वहीं समाप्त हो जाते है जहां से 

किसी दूसरे की सीमा शुरू होती है। ऐसे में दादरी के इखलाक को मारने का 

सवाल ही नहीं पैदा होता।

कोई हिंदू हो या मुसलमान सारे धर्म हम सब ने अपनी दूकानें चलाने के 

लिए बनायीं हैं। क्या किसी के भगवान और अल्लाह उस समय जगे नहीं 

थे, जब इखलाक को भीड़ गोश्त समझ कर खा गयी। इनके सबके पेट और 

धर्म की भूख शांत हो गयी।  

वाह से धर्म के ठेकेदारों । जब कोई बेरोजगारी से मरता है तो कहां गया 

रहते है तुम धर्म के ठेका लेने वालों। करोड़ों की मूर्तियां बनाकर हर साल 

पानी में बहा देने वालों जाओं और दुनिया का चक्कर काटो और कहो कि

हमें कोई महाशक्ति बना दे। क्यों बनाए कोई तुम्हें महाशक्ति। इसलिए कि 

तुम डिजिटल होकर दुनिया को तहत नहस कर दो। सबकों अपने कैमरे के 

दायरे में कर लो। 


बड़ी-बड़ी बातों से नेताओं के गरीबों का पेट नहीं भरता। वह अपने मेहनत 

और मजदूरी से अपना पेट भरते हैं।  सपना बेचने वाले कभी हकीकत के 

जमीन पर सोए हो तो न। हमारा देश हमारे नेताओं का गुलाम है। 

हमारे भ्रष्ट नेता हमें लूटते आएं हैं और हम देखते रहते हैं। बिहार के चुनाव 

नजदीक है तो लालू यादव से शुरू करता हूं। चारा घोटाले के बाद क्या 

जनता को नहीं दिखता को इस घोटालेबाज को हम वोट क्यों देंगे। नीतीश 

ने पांच हजार रुपये पर टीचरों की भर्ती कर ली। बाद में जब वह युवा 

नीतीश से तनख्वाह बढ़ाने की बात कहने लगे, तो नीतीश ने उन्हें लाठियों

से पिटवाया। यहीं हैं न हमारे नेता। अमित शाह व्यापारी आदमी है, देश 

को जुमला सुनाते है। इनकी सरकार बना दीजिए। जुमलों की सरकार 

चाहिए तो।


क्या जनता ही सबसे निरीह प्राणी है। गरीबी सबसे बड़ा अभिशाप है। देश 

के दिग्गज कलाकार शाहरुख और सलमान से लगाए आमिर तक को हिंदू

और मुसलमान नहीं दिखता। भाजपा के दोनों प्रवक्ताओं की बीबियां हिंदू है 

शाहनवाज और मुख्तार की क्या इनकों हिंदू -मुसलमान नहीं दिखता।

इखलाक का कत्ल क्यों हुआ। इस पर बड़े मंथन की जरूरत है। बस 

मुसलमान  और बीफ के बहाने सरेआम किसी को पीट-पीट कर मार डाला

जाए तो घिन आती है इन धर्म के ठेकेदारों से।

  
PTI