अजय कुमार पांडेय
बसपा सुप्रीमो मायावती पर स्वामी प्रसाद मौर्या ने दलित नहीं दौलत की बेटी हैं मायावती कहकर सनसनी मचा दी। यह पहली बार नहीं है कि मायावती पर किसी ने पैसे लेकर टिकट देने का आरोप लगाया है। इससे पहले भी मायावती पर अखिलेश दास, बाबू सिंह कुशवाहा, दारा सिंह चौहान और रामवीर उपाध्याय ने हमला बोला है।
राजनीतिक गलियारों में जब मायावती के टिकटों के नीलाम किए जाने की खबरों पर दलित वर्ग आम तौर पर चुप्पी साधे रहता है। जाहिर है माया का यह दौलत प्रेम वोटों के स्थानांतरण के जरिए उनके कारोबार को बढ़ावा देता है। कांशीराम की स्थापित की गई बहुजन समाज पार्टी का यह चेहरा बहुत पहले से बेनकाब होता रहा है। जिस दलित समाज को सामाजिक स्तर के ऊपरी सतह पर लाने के लिए यह पार्टी बनी थी। उसे अब पार्टी पूरी तरह से नकार चुकी है। ऐसे में पार्टी के अंदर अंतर विरोधों का बढ़ना मायावती के लिए एक संकेत है। वह संभल जाए।
दलित तबके को महज वोट बैंक की तरह देखने वाली मायावती के लिए यह खतरे की घंटी है कि वह अपनी दलित राजनीति को नया रूप दें। जिससे दलित समाज को माया में आस्था बरकरार रखने को बल मिल सके। आजादी के करीब 68 सालों के बाद अब दलित समाज में कई तरह के बदलाव आए है। महज वोट बैंक के तौर पर माया अब बहुजन की सोशल इंजीनियरिंग कर दलितों पर राज नहीं कर सकतीं।
एक के बाद पार्टी से छिटकते नेताओं का जाना बसपा में कोई नई बात नहीं है। पर माया पर लगते आरोप उन्हें कमजोर करने में कोई नहीं छोड़ेंगे। चाहे जन्मदिन की पार्टी में गहनों से लदी मायावती की बात करें या पार्टी चंदे के नाम पर की जा रही धनउगाही की। माया ने अपने विधायकों और सांसदों को टिकट देते समय हर बार खूब पैसा वसूला। शायद मायावती जानती है कि यह विधायक और नेता अपने पैसे की वसूली जनता से कर ही लेते हैं। ऐसे में यह मायावती की बसपा पालिटिक्स का नया मंत्र हो सकता है।







