बिहार में फिर से नीतिश कुमार के नारे से सजे पोस्टर दिख रहे हैं. बड़े नेताओं की रैलियों की भरमार है. भाजपा से लेकर जदयू गठबंधन में नारे खूब गढ़े जा रहे हैं. लेकिन इन नारों के पीछे की असलियत क्या है. जमीन पर कुछ बदलाव हुए है या नहीं. तमाम ऐसी बातें हैं जिनकी पड़ताल जनता को करनी चाहिए. शिक्षा, स्वास्थ्य , रोजगार की जमीनी हकीकत क्या है. बिहार की जनता और पलायन में दूसरे बड़े महानगरों में जी रहे लोगों को करना चाहिए. यही समय है जब जनता को अपने चारो तरफ हुए विकास की कहानी की पड़ताल करनी चाहिए. लालू का जंगल राज बिहार ने देखा है, नीतिश का विकास भी देखा, अब मोदी की सरकार भी लोग देख रहे हैं. दिल्ली में अरविंद केजरीवाल का आम आदमी का सच भी लोग देख चुके हैं. बड़े-बड़े चुनावी वादों की हकीकत का सच लोग जानते हैं. फ्री की वाई-फाई और फ्री का बिजली पानी इन्हीं नारों के बीच जातियों का आरक्षण और अब पिछड़ी जातियों में भी महापिछड़ी का खेल. सभी पार्टियां मदारी के तरह खेल दिखाने से पहले भीड़ जुटाने में लगी हैं. ऐसे में दर्शक को जुटाना भर इस चुनावी पर्व का मकसद नहीं हो सकता है. बेहतर है बिहार जाग जाए और अपनी मुसीबतों के हल इन देश के चोर नेताओं से पूछे , कि कितना बदला बिहार ?
Tuesday, 1 September 2015
बदला बिहार मगर कितना
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