Friday, 18 September 2015


कांग्रेस का सच और झूठ
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 अजय कुमार पांडेय



 अजय कुमार पांडेय
आजादी के अड़सठ सालों के बाद भी आज भी हम सड़क ,पानी , बिजली के लिए ही अपने नेताओं का मुंह देख रहे हैं। कांग्रेस ने देश के आजादी की खूब कीमत वसूली। पार्टी परिवारवाद के चपेट में आ गयी। मानो पूरा देश नेहरू-गांधी की थाती हो। कांग्रेस के युवराज राहुल की स्थिति पूरे देश से छिपी नहीं है। कांग्रेस के बड़े से बड़े नेता राहुल को राजनीति का ककहरा सिखाने में नाकामयाब रहे। नेहरू से इंदिरा और फिर संजय से होती हुई राजीव को सत्ता की कमान सौंपने वाली पार्टी हमेशा से राष्ट्र को दोयम दर्जे का बनाए रखी। यह कांग्रेसी विलासिता की हद थी कि नेहरू के कपड़े पेरिस तक धोने के लिए गये। उस जमाने में मीडिया की पहुंच आमजन तक नहीं थी । नहीं तो कही खुलासे भी सामने आते।
असल मुद्दे की बात करें तो देश के इतने सालों के आजादी के बाद कांग्रेस ने जो नेताओं की छवि बनाई इसकी शिकार देश की दूसरी आने वाली पार्टियां भी हुईं। जो कांग्रेसी नेताओं के दोहरेपन को देखकर ही जन्मीं थी। कुछ जन प्रतिनिधियों की बात छोड़ दें तो बड़े कांग्रेसी दिग्गज भी कोई बड़ा परिवर्तन नहीं ला सके। देश के दो बड़े राज्यों की बात करें तो यूपी और बिहार केवल नेता पैदा करते रहे. लेकिन इन दोनों राज्यों की जमीनी हकीकत कुछ नहीं बदली। कांग्रेसी नेता जनता से चुनकर जाने के बाद दिल्ली और प्रदेश की राजधानियों में मौज करते रहे। इनके इलाकों की दशा बद से बदतर हो गयी। इन नेताओं ने जो ऐशो आराम की परिपाटी शुरू की उसके शिकार नये आने वाले नेता हुए। नए नेता झूठ, फरेब, दिखावापन और सत्ता सुख का पाठ खूब बढ़िया से पढ़े। इस तरह लोग अपने गांवों से पलायन कर इन नयी तैयार हो रही राजधानियों की तरफ भागे।
आज करीब 70 साल देश को आजाद होने को जा रहे हैं। हम न बेहतर शिक्षा का कोई ढाचा तैयार कर सके हैं और न ही स्वास्थ्य सुविधाएं विकसित कर पाए हैं। देश की आजादी के बाद से सिर्फ दिल्ली में एक बड़ा सा एम्स बना कर नेहरू-गांधी परिवार ने देश पर बड़ा एहसान किया। लाखों अरबों की संपत्ति का वारिश नेहरू -गांधी परिवार क्या इस बात का हिसाब देगा कि आजादी के बाद से अब तक जब उसने सबसे ज्यादा समय तक राज किया तो यह व्यवस्थाएं ऐसी क्यों हैं। इसका जवाब शायद कांग्रेसी नेताओं के पास भी न हो, सोनिया और राहुल से इस बात की उम्मीद नहीं की जा सकती। देश से बाहर पले -बड़े राहुल को देश की संस्कृति पचती नहीं है। उन्हें गरीबी की सही दास्तां भी मालूम नहीं है। तभी तो वह बुझे मन से अनमने ढंग से कांग्रेस और देश की कमान अपने हाथों में थाम रहे हैं। ऐसे में एक वक्त आएगा जब कई दिग्गज कांग्रेसी जमात के दूसरे नेताओं से जनता जवाब तलब करेगी कि आप केवल पार्टी के हैं या देश के। 
राहुल की नासमझी कि वजह से देश को दस सालों फिर से गुमराह होना पड़ा। मनमोहन की तर्ज पर एक ऐसा प्रधानमंत्री देश को मिला जो बड़े फैसले अधिकार के साथ नहीं ले सका। मनमोहन हमेशा से कांग्रेस प्रमुख सोनिया का मुंह ताकते रहे, मैडम की हां का इंतजार देश भोगता रहा। इस तरह से कांग्रेस की कमान संभालने के लिए हर कांग्रेसी भी राहुल के हां और राजनीतिक परिपक्वता का इंतजार कर रहा है। मानो कांग्रेस की दूसरी पात नेताओं से खाली है। इस तरह आज देश में कोई सशक्त विपक्ष नहीं दिखाई देता। लोकसभा में मोदी सरकार का बहुमत है लेकिन राजसभा में भी कोई बेहतरीन चर्चा नहीं दिखाई देती। इस तरह के निराशाजनक हालात में कांग्रेस डूबी हुई है। ऐसे में कई सवाल कांग्रेस से देश करता है कि पूरे देश की एक पार्टी को केवल एक परिवार विशेष का क्यों बना दिया गया।


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