Friday, 18 September 2015

जिंदा कौमे पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को खुला खत

 
     आपको यह पोस्ट पढ़ते वक्त कई दूसरे फेसबुक लेखकों की नकल का भ्रम हो सकता है. लेकिन यह सच है यह दूसरों की नकल ही है. जब पानी सिर से ऊपर उठ गया हो और जी अफनाने लगा हो तो आप भी खुला खत लिख सकते हैं. मुद्दा शिक्षा मित्रों को स्थायी नहीं करने के हाईकोर्ट के फैसले से उपजे हालात का है. उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार शिक्षा मित्रों के जारी हड़ताल को लेकर विधि मान्य रास्ते की तलाश में जुट गयी है. शिक्षा मंत्री राम गोविंद चौधरी से लगाए मुख्यमंत्री सहित मामले को आलाधिकारी मथने में जुट गये हैं. कहां से कौन सी संजीवनी खोज के लाई जाये ताकि शिक्षा मित्रों को उत्तर प्रदेश में सहायक शिक्षकों के पदों पर मान्य तरीके से बैठाया जा सके.

समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव विधि मान्य रास्ते की दुहाई दे रहे हैं. वह शिक्षा मित्रों से कह रहे हैं कि सरकार उनकी समस्या का सही हल निकालेगी. लेकिन मुख्यमंत्री जी क्या आपको पता है कि शिक्षक बनने की सही योग्यता क्या है. अगर नहीं पता तो जान  लिजिए. बीएड पात्रता के साथ टीईटी उत्तीर्ण उम्मीदवार को शिक्षक बनाया जा सकता है. या फिर बीटीसी और टीईटी योग्यता वाले को. एनसीटीई(नेशनल काउंसिल फार टीचर्स एजुकेशन) यह नियम तय करता है. तर्क दिया जा रहा है कि कई राज्यों में बगैर टीईटी पास शिक्षा मित्र स्थाई शिक्षक बना दिये गये. मुख्यमंत्री जी उन राज्यों में मानक पूरा करने वाले ढूंढे नहीं मिल रहे थे. इस वजह से उन्हें बनाना पड़ा. उत्तर प्रदेश में बीएड टीईटी वालों की भारी संख्या है. देहात में कहते हैं पदी क पद बा तो कुपदी क भी पद बा( मतलब जो सही है उसका तो पद है लेकिन जो सही नहीं है उसका भी पद है) मुख्यमंत्री जी बस यही हो रहा है.  कई सालों पहले यह शिक्षा मित्र कई तरह की धांधली के साथ इन पदों पर तैनात कर दिये गये. इनकी योग्यता और शिक्षा के प्रमाण पत्रों की जांच में भी भारी लापरवाही की गयी. इतना ही नहीं मनमाने तरीके से बहुत सारे लोगों को शिक्षा मित्र के पदों पर भर दिया गया. कुछ लोगों ने तो अपने पढ़े लिखे पाल्यों को ही हेरफेर करके शिक्षा मित्र बना दिया.
उत्तर प्रदेश में शिक्षा की व्यवस्था का आलम मुख्यमंत्री जी आपसे छुपा नहीं है. आप ऑस्ट्रेलिया से पढ़कर आए हैं तो वहां की शिक्षा व्यवस्था को जानते हैं. हमारे राज्य में आप तीन साल से सत्ता के शिखर पर बैठे हैं. ऐसे में आप से भली भांति परिचित होंगे. परीक्षाओं में नकल, तमाम दूसरी तरह की गड़बड़ियों की भरमार रहती है. कभी स्कूल व्यवस्था को आपको पास से जाकर देखने का समय मिला होगा तो शायद आप देखे भी होंगे. मुख्यमंत्री के आने से पहले स्कूलों को रंग-रोगन करके सजाने और अच्छा दिखाने की प्रक्रिया पूरे भारत में अच्छी तरह से है. लेकिन इसके बाद भी हमारे आलाधिकारी और नेता जानबूझकर अपनी आंखें मूंद लेते हैं. मानों आंखें मूंद लेने से बाहर अंधेरा हो जायेगा. इन सबके बीच पिछले दिनों कन्नौज की सांसद डिंपल यादव भी किसी स्कूल के दौरे पर जाकर व्यवस्था से रूबरू हुई थी. पढ़कर और देखकर अच्छा लगा. लेकिन क्या एक सेलिब्रिटी के तौर पर ही हमारे नेता इन जगहों का सर्वेक्षण करना पसंद करते हैं, यह कचोटने वाला है.
गुरु अपने छात्रों को रचता है. उन्हें संस्कार देता है. कहते हैं किसी गुरु का शिष्य उतना ही आगे जा सकता है जितना की गुरु की दूरदृष्टि होगी. ऐसे भी शिक्षा मित्र इस पैमाने पर खरे नहीं उतरते. रहा सवाल शिक्षा मित्रों को स्थाई शिक्षक बनाने का तो क्यों आप उन्हें स्थाई शिक्षक बनाएंगे. जब प्रदेश में लाखों बेरोजगार बीएड और टीईटी पास की योग्यता लेकर सड़कों पर घूम रहे हैं. क्यों नियमों को तांक पर रखकर आप इन्हें स्थाई शिक्षक बनाना चाहते हैं, जब ये योग्यता का मानक ही नहीं पूरा करते. क्या शिक्षक का पद आपको इस तरह का दिखता है कि आप जिसको चाहे उसी को बैठा दें. किस विधि मान्य रास्ते की आप बात कर रहे है. शिक्षक और गुरु की महत्ता से क्या आप अंजान है. जो बालकों के भविष्य की अनदेखी करके आप इन शिक्षा मित्रों को स्थाई शिक्षक बनाना चाहते हैं. इन शिक्षा मित्रों की तैनाती प्राथमिक स्कूलों में एक सहायक के तौर पर हुई थी, इन्हें एक निश्चित पारिश्रमिक दिया जाना था. फिर वह कौन सा कारण है या मजबूरी है जिससे आप इस तरह की बात कह के प्रदेश में युवाओं और शिक्षा मित्रों को गुमराह कर रहे हैं.
शिक्षा मित्रों को स्थाई शिक्षक बनाये जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण मुझे वोट बैंक पालिसी दिखती है. मुख्यमंत्री जी आपको इन शिक्षा मित्रों में वोट बैंक नजर आ रहा है. साल 2017 के चुनावों में यह वोट बैंक आप को जिता सकता है या हरा सकता है. लेकिन जान लिजिए आप विदेश में जाकर पढ़के आएं हैं हमारे यहां करोड़ों लोगों को इन्हीं प्राइमरी स्कूलों का भरोसा है, किसानों, मजदूरों, बेरोजगारों के बेटे-बेटियां इन स्कूलों में जाते हैं. आप इनके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते. एक किसान और मजदूर के बेटे की जिंदगी आप को बरबाद करने का कोई हक नहीं है. आप की गलती की वजह से शिक्षा मित्र अगर स्थाई शिक्षक बने तो आने वाली पीढ़ियां आपको शायद ही माफ करें.
मुख्यमंत्री जी आपको शायद याद आए या न आए हमें याद है. किसी कार्यक्रम में जब आप चेक बांट रहे थे तो आपने उस महिला से पूछा कि हमें जानती हो तो उस महिला ने किसी और का नाम कह दिया. आप को बात बुरी लगी. लेकिन इसकी सच्चाई है जिस तरह का शासन आजकल पार्टियां चला रही हैं, उससे किसी मुख्यमंत्री को याद करने की नौबत नहीं दिखाई देती है. हर दूसरा मुख्यमंत्री लालीपॉप लिये आ जाता है. ऐसे में कोई मुख्यमंत्री नजीर बने तो इसके लिए उस तरह की कवायद भी करनी होगी.
युवा है आप मुख्यमंत्री जी ऊर्जा से भरपूर है. तो शायद ऊर्जा का मायने भी समझते होंगे. ऊर्जा का केवल रूप बदलता है. प्रदेश को युवा मुख्यमंत्री के तौर पर जब अखिलेश यादव की कमान सौंपी गयी तो लगा था कि शायद कुछ बदलेगा. लेकिन पुरानी पीढ़ियों की तरह ही ढपली बजाएंगे तो आप को कौन याद रखेगा. बदलते परिवेश में रोजगार हर युवा की जरूरत है. ऐसे में नई युवाओं और उद्यमियों को मौका देना सरकार का दायित्व है, लेकिन दायित्व की पूर्ति इस तरह  से अगर की जायेगी तो यह आने वाले समय के लिए खतरे की घंटी है.
बात खत्म नहीं हो रही मुख्यमंत्री जी जिन नियमों की अनदेखी करके आप ने सरकारी खजाने से इन शिक्षा मित्रों को ट्रेनिंग दिलायी. इसका भी आपको जवाब देना होगा. रही बात 72 हजार शिक्षकों की भर्ती के मामले में भी दो बार आवेदन किया गया. करीब 30 से चालीस हजार रुपये हर उम्मीदवार ने फार्म में लगाए. भर्तियां न्यायालय के हस्तक्षेप से हुई. आपने इन भर्तियों में खूब पेचा लगाया. इसके बाद भी अभी दो बार के आवेदन के जरिए सत्ता कोष में पैसे इन बरोजगार टीईटी पास बीएड वालों के जमा है. आपको उसका कोई विधि मान्य रास्ता नहीं दिखाई देता कि सरकार कोष में जमा इन बेरोजगारों के पैसे वापस कर दिये जाये.

जाइए मुख्यमंत्री जी जाइए, विधि मान्य रास्ते की तलाश कीजिए, सरकारी खजाने में जमा रुपयों से लैपटॉप बांटिए, लेकिन सवाल जस का तस है जब इन शिक्षा मित्रों के पढ़ाए बच्चे आप से हिसाब मांगेंगे तो मत कहिएगा कि मुझे पता नहीं था कि ये एनसीटीई की गाइडलाइन को पूरा नहीं करते.       








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